कांग्रेस की लगातार हार से उठने लगे बदलाव के स्वर, नेतृत्व ब्लूप्रिंट की तैयारी में

एक बार फिर सक्रिय हो सकता पार्टी का जी-23 समूह

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नई दिल्ली। कांग्रेस बदलाव की आहट कई महीनों से सुनाई दे रही है। पार्टी नेतृत्व ने इस बारे में कई मौकों पर संकेत दिया है, लेकिन अभी तक पार्टी में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है, लेकिन अब पार्टी के अंदर से बदलाव की आवाज जोर-शोर से उठने लगी है। कांग्रेस नेताओं का एक बड़ा वर्ग अगले हफ्ते बेंगलुरु में होने वाली बैइक का इंतजार कर रहा है। 26 दिसंबर को बैठक होनी है। उसके बाद बदलाव नहीं हुआ तो एक बार फिर से पार्टी का पुराना सिरदर्द जी-23 समूह सक्रिय हो सकता है।
इस बार जी-23 में दूसरे नेता होंगे। इन नेताओं का आरोप है कि पार्टी के अंदर फैसले नहीं होने से कार्यकर्ताओं में अब बेचैनी नजर आने लगी है। नेताओं का यह समूह पार्टी को चेतावनी दे रहा है कि अगर अब फैसले नहीं लिए तो ये कार्यकर्ता अपने लिए नया विकल्प तलाशना शुरू कर देंगे। कांग्रेस नेतृत्व को भी इसका अहसास हो गया है और वह बदलाव का ब्लूप्रिंट जल्द पेश करने की तैयारी में है।
दरअसल, बदलाव की सारी प्रक्रिया एक अहम पद पर आकर रुक रही है। पार्टी के इस सबसे अहम पद पर किस तरह का बदलाव हो और किसे वहां रखा जाए, यही चुनौती इसमें सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। पार्टी के सीनियर नेता मणिशंकर अय्यर अपनी किताब में उन्होंने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। हालांकि उनके सवालों की कोई खास चर्चा नहीं हो पाई। पार्टी को उनसे यह उम्मीद नहीं थी कि वह अपनी किताब में ऐसे सवाल उठाएंगे।
अब चर्चा हो रही है कि पार्टी के एक और सीनियर नेता अपनी किताब लेकर आ रहे हैं। पार्टी नेतृत्व किताब का कंटेंट पता लगाने की कोशिश कर रहा है। इससे पहले जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने अपनी किताब में ऐसी बात लिख दी, जिससे बीजेपी को कश्मीर में कांग्रेस पर हमला करने का मौका मिल गया था। 2014 में भी पीएम डॉ. मनमोहन सिंह के सलाहकार द्वारा लिखी किताब ने राजनीतिक बवाल मचा दिया था और उससे पार्टी को बहुत नुकसान हुआ था। कांग्रेस नेता ने इस ट्रेंड पर चुटकी लेते हुए कहा कि बीजेपी इसलिए अपने नेताओं को लिखने की अनुमति नहीं देती है।
संविधान पर लोकसभा में हुई चर्चा में कांग्रेस की ओर से कौन-कौन स्पीकर हिस्सा लेंगे, इस बारे में पार्टी में अंतिम समय तक दुविधा बनी रही। सबसे बड़ी दुविधा तो इस बात को लेकर थी कि प्रियंका गांधी और राहुल गांधी, दोनों संविधान पर हो रही इस बहस में भाग लें या नहीं। एक वर्ग का मानना था कि एक बहस में दोनों का भाषण न हो, लेकिन दूसरा तर्क यह आया कि बतौर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अब तकरीबन हर बहस में भाग लेंगे। ऐसे में इस आधार पर प्रियंका गांधी को दूर रखना सही नहीं होगा।
इन दिनों दो क्षेत्रीय दलों के सांसदों के अगले कदम को लेकर बहुत चर्चा है। एक पार्टी के राज्यसभा सांसदों के बारे में लोकसभा चुनाव के बाद से उलझन है, तो दूसरी पार्टी के लोकसभा सांसदों के बारे में हालिया विधानसभा चुनाव के बाद उलझन बन गई है। इनके बारे में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं और दबे स्वरों में कहा जा रहा है कि मौका मिलने पर वे पाला बदल सकते हैं। इस तरह की चर्चाओं से दोनों दलों के नेतृत्व के कान खड़े हो चुके हैं।
संसद सत्र के दौरान दोनों दलों के सांसदों को हमेशा एक साथ दिखाने की कोशिश की गई। दोनों दलों के सांसद अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं और वे अपने लिए तमाम विकल्प टटोल रहे हैं। एक दल के सांसद ने कहा कि वे ऐसे दोराहे पर खड़े हैं जहां उन्हें आगे की राह समझ नहीं आ रही है और कल वह क्या कदम उठाएंगे, उन्हें खुद नहीं पता। केंद्र सरकार के कई मंत्री और बीजेपी के नेता अब जाकर कुछ राहत महसूस कर रहे थे।

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